तेरे लौट आने तक

तेरे लौट आने तक


तेरे लौट आने तक


तेरे जाने के बाद,
घर तो वही रहा,
दीवारें भी वहीं खड़ी रहीं,
खिड़कियों से आती धूप भी वैसी ही रही,
लेकिन जाने क्यों,
सब कुछ बदल गया।

आंगन में रखा वह पुराना झूला,
आज भी हवा के संग झूलता है,
पर उसमें अब हँसी नहीं गूंजती,
सिर्फ़ यादों की चरमराहट सुनाई देती है।

तेरे कदमों की आहट
आज भी मेरे कानों में बसती है।
कभी लगता है,
अभी दरवाज़ा खुलेगा,
तू मुस्कुराते हुए कहेगा—
"इतना उदास क्यों बैठे हो?
मैं तो बस थोड़ी देर के लिए गया था।"

लेकिन दरवाज़ा खुलता है,
तो सामने सिर्फ़ हवा खड़ी होती है।
और मैं फिर मुस्कुरा देता हूँ,
ताकि मेरी आँखें
मेरे दिल का राज़ न खोल दें।

मैंने तेरे जाने के बाद
घड़ी देखना छोड़ दिया।
क्योंकि समय अब
मिनटों और घंटों में नहीं,
तेरी यादों में बीतता है।

हर सुबह
तेरे नाम से शुरू होती है,
और हर रात
तेरे इंतज़ार पर खत्म।

चाँद जब भी आसमान में निकलता है,
मैं उससे पूछता हूँ—
"क्या आज तुमने उसे देखा?"

वह चुप रहता है,
लेकिन उसकी चाँदनी
मेरे कंधे पर हाथ रखकर
जैसे कहती है—
"उम्मीद अभी बाकी है।"

बरसात आती है,
तो हर बूंद में
तेरी हँसी सुनाई देती है।
सर्दियों की धूप
तेरे हाथों की गर्माहट बन जाती है।
बसंत के फूल
तेरी मुस्कान की तरह खिल उठते हैं।
और पतझड़...
पतझड़ तो बिल्कुल मेरी तरह है,
जो हर दिन
कुछ न कुछ खो देता है।

मैंने तेरी तस्वीर से
बातें करना सीख लिया है।

जब कोई नहीं होता,
मैं तुझे सब कुछ बता देता हूँ।
कैसे दिन बीता,
किसने मेरा हाल पूछा,
कौन मिला,
कौन बिछड़ गया।

तस्वीर कुछ नहीं कहती,
लेकिन उसकी खामोशी
हर बार मुझे जवाब दे जाती है।

कई लोगों ने कहा—
"भूल जाओ उसे,
ज़िंदगी आगे बढ़ाओ।"

मैंने मुस्कुराकर पूछा—
"क्या कोई अपनी साँसों को भूल सकता है?
क्या कोई अपना आसमान बदल सकता है?
क्या कोई अपनी धड़कनों से रिश्ता तोड़ सकता है?"

वे चुप हो गए।

क्योंकि प्रेम
समझाने की चीज़ नहीं,
महसूस करने का नाम है।

मैंने तेरे लिए
एक दीपक जलाकर रखा है।

हर शाम
उसे अपने हाथों से जलाता हूँ।
सोचता हूँ,
अगर कहीं अँधेरे रास्ते में
तुझे मेरी याद आए,
तो शायद
इस दीपक की लौ
तुझे मेरे घर तक ले आए।

मैंने तेरे हिस्से की
एक कुर्सी अब भी खाली रखी है।
कोई उस पर बैठना चाहता है,
तो मैं प्यार से मना कर देता हूँ।

क्योंकि मुझे विश्वास है,
एक दिन
तू आएगा,
और बिना कुछ कहे
उसी कुर्सी पर बैठ जाएगा।

तेरी पसंद की किताबें
आज भी अलमारी में वैसे ही रखी हैं।
उनके बीच
एक सूखा गुलाब रखा है,
जो कभी तूने
मेरी किताब में छुपाया था।

वह गुलाब अब सूख चुका है,
लेकिन उसकी खुशबू
अब भी ज़िंदा है।

शायद
सच्चा प्रेम भी ऐसा ही होता है।

समय उसे मुरझा देता है,
लेकिन मिटा नहीं पाता।

मैंने कई बार
तुझे भूलने की कोशिश की।

तेरा नाम
अपने होंठों से हटाना चाहा,
तेरी यादों को
दिल से निकालना चाहा।

लेकिन जितना दूर जाना चाहा,
उतना ही
तेरे करीब होता गया।

फिर समझ आया—
प्रेम से भागा नहीं जाता,
उसे सिर्फ़ जिया जाता है।

रात के आख़िरी पहर में,
जब पूरी दुनिया सो जाती है,
मैं छत पर जाकर
आसमान देखता हूँ।

एक-एक तारा
मुझे तेरी आँखों जैसा लगता है।
हवा
तेरी आवाज़ लेकर गुजरती है।

और मैं
अपनी सारी बातें
आसमान को सौंप देता हूँ।

अगर कभी
तुझे भी किसी रात
अचानक मेरी याद आए,
तो उसी आसमान की ओर देखना।

यकीन मान,
हम दोनों की नज़र
किसी एक ही तारे पर मिलेगी।

मैंने अपने आँसुओं से
अब दोस्ती कर ली है।

वे आते हैं,
कुछ देर बैठते हैं,
और फिर चुपचाप चले जाते हैं।


तेरे लौट आने तक


जैसे उन्हें भी पता हो,
कि इस दिल में
तेरे अलावा
किसी और के लिए जगह नहीं।

लोग पूछते हैं—
"अगर वह कभी लौटकर न आया तो?"

मैं मुस्कुरा देता हूँ।

क्योंकि प्रेम
सिर्फ़ मिलने का नाम नहीं।

प्रेम तो वह विश्वास है,
जो दूरी से भी नहीं टूटता।

अगर तू लौट आया,
तो यह इंतज़ार
मेरी सबसे बड़ी खुशी बन जाएगा।

और अगर नहीं लौटा,
तो यही इंतज़ार
मेरी सबसे खूबसूरत कहानी बन जाएगा।

मैंने अब शिकायत करना छोड़ दिया है।

किस्मत से भी नहीं,
समय से भी नहीं।

क्योंकि जिसने
तुझे मेरी ज़िंदगी में भेजा,
वही जानता होगा
कि तुझे कब वापस भेजना है।

मैं बस इतना जानता हूँ—
मेरा दिल
आज भी तेरे नाम से धड़कता है।

मेरी हर दुआ में
तेरा नाम शामिल है।

मेरे हर गीत की
पहली पंक्ति
तेरी याद से शुरू होती है।

और आख़िरी पंक्ति
तेरे लौट आने की उम्मीद पर खत्म होती है।

अगर तू लौटेगा,
तो मैं कोई शिकायत नहीं करूँगा।

न यह पूछूँगा
कि इतनी देर क्यों हुई।

न यह जानना चाहूँगा
कि किन रास्तों ने तुझे रोक लिया।

मैं सिर्फ़
तेरा हाथ पकड़ूँगा,
और चुपचाप
अपनी धड़कनों को
तेरी धड़कनों से मिला दूँगा।

क्योंकि कुछ रिश्ते
शब्दों से नहीं,
खामोशियों से पूरे होते हैं।

और अगर उस दिन
मेरी आँखों में आँसू हों,
तो समझ लेना—
वे दुख के नहीं,
बरसों के इंतज़ार की जीत के आँसू होंगे।

उस दिन
यह घर फिर से घर बन जाएगा।

आँगन फिर हँसेगा।

हवा फिर गुनगुनाएगी।

चाँद फिर पहले से ज़्यादा खूबसूरत लगेगा।

और मैं
अपनी हर अधूरी कविता
तेरे नाम पूरी कर दूँगा।

लेकिन...

जब तक वह दिन नहीं आता,
जब तक तेरे कदम
इस चौखट को फिर से नहीं छूते,
जब तक तेरी मुस्कान
मेरी सुबह नहीं बनती,
जब तक तेरी आवाज़
मेरी शाम नहीं सजाती,

मैं यहीं रहूँगा...

इसी दरवाज़े पर,
इसी उम्मीद के साथ,
इसी विश्वास के साथ।

हर सूर्योदय से कहूँगा—
"शायद आज..."

हर शाम से पूछूँगा—
"क्या वह आया?"

हर चाँद से कहूँगा—
"उस तक मेरा सलाम पहुँचा देना।"

और हर रात
अपने दिल को यही समझाऊँगा—

**मैं इंतज़ार करूँगा...
तेरे लौट आने तक।

मैं मुस्कुराता रहूँगा...
तेरे लौट आने तक।

मैं प्रेम निभाता रहूँगा...
तेरे लौट आने तक।

क्योंकि मेरा प्रेम
समय का मोहताज नहीं,
वह विश्वास की वह लौ है
जो तब तक जलती रहेगी,
जब तक मेरी आख़िरी साँस
तेरा नाम लेकर
खामोशी में खो न जाए।**


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